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 बिजली विभाग में नौकरी की नीलामी? डेढ़-दो लाख दो और कम्प्यूटर ऑपरेटर बन जाओ?

Sarvoday Times 3 months ago 1 minute read 0 comments
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न विज्ञापन, न मेरिट, न इंटरव्यू… फिर कैसे बंट गईं बिजली विभाग की नौकरियां?।

कुशीनगर, । बिजली विभाग की कम्प्यूटर ऑपरेटर भर्ती अब सवालों के घेरे में है। आरोप है कि यहां नौकरी योग्यता पर नहीं, बल्कि नोटों की गड्डियों के वजन से तय हुई है। जिले के बेरोजगार युवा विज्ञापन निकलने का इंतजार करते रह गए और आउटसोर्सिंग कम्पनी डेढ़ से दो लाख रुपये लेकर चुपके-चुपके नियुक्तियां बांट दी। न रिक्तियां सार्वजनिक हुईं, न चयन समिति बनी, न मेरिट सूची जारी हुई, लेकिन नौकरियां मिल गईं। अब सवाल यह है कि यह भर्ती प्रक्रिया थी या बेरोजगारों के सपनों की नीलामी?चर्चा है कि लाखों रुपये लेकर नियुक्तियां बांटी गईं और पूरी प्रक्रिया को इस तरह गोपनीय रखा गया कि जिले के हजारों बेरोजगार युवाओं को भनक तक नहीं लगी।यदि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच हो जाए तो भर्ती के नाम पर चल रहे इस बड़े खेल से पर्दा उठ सकता है।

सूत्रों के अनुसार सिर्फ पडरौना विद्युत उपकेंद्र पर ही तकरीबन 17 कम्प्यूटर ऑपरेटरों की नियुक्ति की गई है। आरोप है कि इन सभी नियुक्तियों के पीछे लाखों रुपये का खेल हुआ। आरोप के अनुसार यदि प्रत्येक अभ्यर्थी से डेढ़ से दो लाख रुपये तक लिए गए हैं तो सिर्फ एक उपकेंद्र पर ही करोड़ों नहीं तो लाखों रुपये की अवैध वसूली का अनुमान लगाया जा रहा है। और यह तो केवल एक बानगी बताई जा रही है। जिले के अन्य विद्युत उपकेंद्रों पर भी इसी तरह नियुक्तियां किए जाने की चर्चा है। मामले को और गंभीर इसलिए माना जा रहा है क्योंकि भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता का कोई प्रमाण दिखाई नहीं दे रहा है।  महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जिन युवाओं को नौकरी मिली, उनके चयन का आधार क्या था? मेरिट क्या थी? आवेदन कब लिए गए? चयन समिति में कौन-कौन लोग शामिल थे? और यदि कोई प्रक्रिया हुई तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? यह तमाम यक्ष प्रश्न है जिसका जबाब विभाग व आउटसोर्सिंग कम्पनी के पास है। 

जानकारों का कहना है कि किसी भी आउटसोर्सिंग कम्पनी द्वारा भर्ती करते समय निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन करना आवश्यक होता है। रिक्तियों का प्रकाशन, आवेदन आमंत्रित करना, पात्रता की जांच और निष्पक्ष चयन प्रक्रिया अपनाना सामान्य नियम हैं। लेकिन यहां पूरा मामला पर्दे के पीछे निपटाए जाने की चर्चा है, जिससे भर्ती की निष्पक्षता पर गंभीर संदेह पैदा हो रहा है। कहना ना होगा कि बेरोजगारी की मार झेल रहे युवाओं के लिए सरकारी विभागों से जुड़ी नौकरियां उम्मीद की किरण होती हैं। लेकिन यदि नौकरी का रास्ता योग्यता नहीं बल्कि पैसों से तय होने लगे तो यह व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है। सवाल यह भी है कि जिन युवाओं ने कथित तौर पर लाखों रुपये खर्च कर नौकरी हासिल की है, वे भविष्य में उस रकम की भरपाई किस तरह करेंगे? अब देखना दिलचस्प है। बिजली विभाग के उच्च अधिकारी और जिला प्रशासन नियम विरुद्ध नियुक्त के खिलाफ क्या कार्रवाई करते है। क्योंकि सवाल सिर्फ 17 नियुक्तियों का नहीं है, सवाल यह है कि क्या कुशीनगर में बिजली विभाग की नौकरियां अब योग्यता से नहीं, बल्कि ‘बोली’ लगाकर बांटी जा रही हैं?

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