उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने कहा है कि महापुरुष केवल वर्तमान को जीने वाले नहीं होते, बल्कि उनके कार्य और कार्ययोजनाएं भविष्य की सुदृढ़ नींव तैयार करती हैं। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनता है। युग पुरुष ब्रह्मलीन महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज ने लगभग 94-95 वर्ष पूर्व, जब देश गुलाम था और साधन-संसाधनों का अभाव था, तब गोरखपुर में शिक्षा का जो बीज महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के रूप में रोपा था, वह आज विशाल वटवृक्ष बन चुका है।
मुख्यमंत्री जी आज श्री गोरखनाथ मन्दिर, गोरखपुर में सप्तदिवसीय पुण्यतिथि समारोह के अवसर पर आयोजित ‘युग पुरुष ब्रह्मलीन महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज की पुण्यतिथि’ विषयक व्याख्यान सत्र में अपने विचार व्यक्त कर रहे थे। मुख्यमंत्री जी ने कहा कि आज युग पुरुष ब्रह्मलीन महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज की पावन पुण्यतिथि है और कल आश्विन कृष्ण चतुर्थी को उनके (मुख्यमंत्री जी के) पूज्य गुरुदेव ब्रह्मलीन महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज की पावन पुण्यतिथि है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि प्रतिवर्ष पूज्य महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज तथा पूज्य गुरुदेव ब्रह्मलीन महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज की पुण्य स्मृति में गोरक्षपीठ की ओर से आचार्यद्वय के श्रीचरणों में नमन करते हुए कृतज्ञता ज्ञापित की जाती है। साथ ही, स्मृति व्याख्यानमाला तथा विभिन्न धार्मिक आयोजन भी सम्पन्न होते हैं। महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद से जुड़ी विभिन्न संस्थाएं भी उन विषयों और आदर्शों को केन्द्र में रखकर विशेष स्मृति व्याख्यानमालाएं आयोजित करती हैं, जिनके लिए दोनों पूज्य सन्तों ने अपना पूरा जीवन समर्पित किया।
आज भी परिषद से जुड़ी विभिन्न संस्थाओं में दोनों महापुरुषों के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धांजलि के कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। यहां उपस्थित सन्तों के साथ-साथ अनेक पूज्य सन्त अलग-अलग संस्थाओं में जाकर विद्यार्थियों को अपना मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं। वास्तव में जब हम महापुरुषों के बारे में जानते हैं, उनके जीवन चरित्र को पढ़ते हैं और पूज्य सन्तों के जीवन से प्रेरणा लेते हैं तो जीवन को एक नई दिशा मिलती है। एक सामान्य मनुष्य और एक सन्त, एक सामान्य मनुष्य और एक महापुरुष में यही अन्तर होता है। सामान्य मनुष्य अपने लिए, अपने जीवन और अपने परिवार के बारे में सोचता है, जबकि महापुरुष समाज और राष्ट्र की भावी पीढ़ियों के बारे में सोचता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्ष 1932 में सीमित साधनों के बावजूद महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज ने शिक्षा के एक बीज का रोपण महाराणा प्रताप कॉलेज के रूप में किया। जब उनसे पूछा गया कि महाराणा प्रताप के नाम पर ही संस्था क्यों स्थापित की गई, इसकी प्रासंगिकता क्या है, तो उनका विचार था कि जब भारत को स्वदेश, स्वाभिमान और स्वधर्म का एहसास कराने के लिए किसी महापुरुष का आदर्श सामने रखना हो तो महाराणा प्रताप हम सबके लिए आदर्श उदाहरण हो सकते हैं।
महाराणा प्रताप ने मात्र 28 वर्ष की आयु में अकबर के विरुद्ध स्वदेश, स्वाभिमान और स्वधर्म के लिए युद्ध लड़ा। वे निरन्तर संघर्ष करते रहे। जीवन में जीत और हार की परवाह नहीं की और अन्ततः अकबर द्वारा छीने गए सभी दुर्गों को वापस लेकर मेवाड़ की धरती पर चित्तौड़गढ़ में हिंदुत्व की ध्वजा-पताका को पुनः स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। वे भारत के आदर्श हैं।
महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज चाहते थे कि यहां के युवाओं को देश की स्वाधीनता और राष्ट्र निर्माण के लिए महाराणा प्रताप जैसा आदर्श मिले, जो केवल अपने लिए नहीं, बल्कि देश और समाज के लिए सोच सके। इसी भावना के साथ उन्होंने महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद के रूप में एक बीज का रोपण किया।
स्वतन्त्र भारत में उत्तर प्रदेश का पहला राज्य विश्वविद्यालय गोरखपुर में बना। उसकी नींव को सुदृढ़ करने का कार्य महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज ने किया। आज वही गोरखपुर विश्वविद्यालय के रूप में हमारे सामने है। प्राचीन समय में उनके द्वारा बनाई गई दो संस्थाओं को उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार को दिया और विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए अपना योगदान किया।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि जब महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज से पूछा गया कि विश्वविद्यालय के लिए मठ की इतनी सम्पत्ति क्यों दी जा रही है, तो उन्होंने कहा कि मठ हिन्दू समाज और लोककल्याण के लिए है। यदि मठ की सम्पत्ति लोककल्याण के कार्य में उपयोग आती है तो उसे राज्य सरकार को देने में कोई संकोच नहीं है। हजारों-हजार बच्चे इस विश्वविद्यालय में अध्ययन करेंगे और अपना जीवन बनाएंगे। इसलिए इस लोक उपयोगी और लोक कल्याणकारी कार्य के लिए संस्था को समर्पित किया जा रहा है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि आज महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद से जुड़ी 50 से 55 संस्थाएं संचालित हैं। इसमें विश्वविद्यालय, मेडिकल कॉलेज, आयुर्वेद कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, पॉलिटेक्निक, अनेक महाविद्यालय, सीनियर सेकेण्डरी स्तर के कॉलेज, इण्टर कॉलेज, शिशु स्तर के संस्थान, सेवा के प्रकल्प, अस्पताल, कृषि विज्ञान केन्द्र तथा अन्य अनेक प्रकार के प्रकल्प शामिल हैं। यह सभी निरन्तर लोककल्याण के पथ पर आगे बढ़ रहे हैं।
जब देश परतन्त्र था, तब महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज ने बालिका स्कूल और बालिका कॉलेज की स्थापना की। उस समय कोई बालिका शिक्षा के बारे में इतना सोचता भी नहीं था। उन्होंने संस्कृत महाविद्यालय की भी स्थापना की। उस समय अनेक लोग मानते थे कि गुलामी अस्थायी है, लेकिन महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज जैसे महापुरुषों का विश्वास था कि गुलामी की बेड़ियां टूटेंगी और भारत स्वतन्त्र होगा। उनके मन में संकल्प था कि भारत को उसकी परम्परा और विरासत के अनुरूप आगे बढ़ाना है।
इसी सोच के अनुरूप गोरक्षपीठ की ओर से और गोरखपुर के सांसद के रूप में भी महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज ने अनेक प्रयास प्रारम्भ किए। उसी समय गोरखपुर में फर्टिलाइजर कारखाने की स्थापना और बी0आर0डी0 मेडिकल कॉलेज की स्थापना के कार्यों को भी आगे बढ़ाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।
आज जब हम भारत के सनातन धर्म की परम्परा की ओर देखते हैं तो महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज द्वारा गोरक्षपीठ के स्वरूप को लेकर व्यक्त किए गए विचार अत्यन्त महत्वपूर्ण दिखाई देते हैं। यह शिव-शैव परम्परा में भगवान शिव की परम्परा और नाथ सम्प्रदाय की पीठ है, लेकिन यह सनातन धर्म के लिए समर्पित है। हम किसी संकुचित दायरे में कैद होकर नहीं रह सकते।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि हमारा पंथ और सम्प्रदाय भले ही किसी विशिष्ट उपासना विधि का अनुयायी हो, लेकिन हम सबका कल्याण सनातन धर्म की मजबूती में है। हमारी सुरक्षा और हमारी मजबूती भी इसी में है। इसीलिए किसी भी पंथ और उपासना पद्धति से जुड़े आचार्य या सन्त गोरक्षपीठ में आते हैं तो कोई भेदभाव नहीं होता। एक समभाव के साथ व्यक्ति-व्यक्ति में भी कोई भेदभाव नहीं होता। सभी जातियों के लोग एक ही पंक्ति में बैठकर अन्न ग्रहण करते हैं। किसी भी पंथ और उपासना विधि से जुड़े सनातन धर्मावलम्बी अथवा सनातन धर्म से निकली किसी भी शाखा के आचार्य को गोरक्षपीठ में वही सम्मान प्राप्त होता है जो उनकी अपनी परम्परा की पवित्र पीठों में प्राप्त होता है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि हमारी परम्परा में कहा गया है कि ‘अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्, उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्’ ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का भाव तभी होगा जब हम पहले आपस में एकजुट होकर काम करें। एक भाव, एक स्वर और एक दृष्टि होनी चाहिए। एक साथ चलने की सामर्थ्य होनी चाहिए। यदि 140 करोड़ जनता एक साथ हुंकार करेगी तो दुनिया की कोई ताकत उसके सामने ठहर नहीं सकती। लेकिन यदि हमारे अलग-अलग स्वर होंगे और अलग-अलग गति होगी तो वह प्रगति का नहीं, दुर्गति का कारण बनेगी। अलग-अलग स्वर हमारी ताकत के बजाय हमारी पराजय का कारण बन सकते हैं।
स्वतन्त्र भारत में महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज ने कहा था कि भारत की आजादी का मतलब केवल राजनीतिक स्वाधीनता नहीं है। स्वाधीनता का मतलब सम्पूर्ण स्वाधीनता है। इसका अर्थ यह है कि भारत राजनीतिक रूप से भी और सांस्कृतिक रूप से भी स्वतन्त्र हो। सांस्कृतिक स्वाधीनता का भाव यह था कि यदि भगवान सोमनाथ मन्दिर की पुनः प्राण-प्रतिष्ठा का कार्यक्रम हो रहा है, तो अयोध्या में भी यह कार्य होना चाहिए।
वर्ष 1949 में अयोध्या में श्री रामलला का प्रकटीकरण हुआ। उस समय महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज के साथ बाबा अभिराम दास जी और महन्त रामचन्द्र दास परमहंस जी महाराज जैसे सन्त थे। शक्तिपीठ देवीपाटन बलरामपुर में मां पाटेश्वरी के धाम में महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज, महाराजा बलरामपुर राजा पाटेश्वरी प्रसाद सिंह जी और तत्कालीन गोंडा जिलाधिकारी श्री के0के0 नायर के बीच बनी रणनीति की परिणति श्री रामलला के प्रकटीकरण के रूप में हुई।
महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज ने अनेक कार्यक्रम, अभियान और प्रकल्प स्थापित किए। उन्होंने बिखरी हुई योगी महासभा और नाथ सम्प्रदाय को अखिल भारतीय अवधूत वेष बारह पंथ योगी महासभा के रूप में एकजुट करने का महत्वपूर्ण दायित्व भी निभाया। जो हमारी पहचान है, उसी पहचान को आगे बढ़ाना है। वह निरन्तर इस कार्य में लगे रहे और आगे बढ़ते रहे।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि आज यहां उपस्थित पूज्य सन्तों का सान्निध्य हम सभी के लिए प्रेरणा है। महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद की सभी शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थाओं से मेरा आग्रह है कि अपने संस्थापकों द्वारा प्रस्तुत आदर्शों को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। यदि हम इन आदर्शों को जीवन में उतारेंगे तो जीवन में असफलता कभी नहीं आएगी और सफलता ही सफलता हमारे जीवन का हिस्सा बनेगी। इसके लिए हमें सदैव तत्पर रहना होगा।
आज अयोध्या में भगवान श्रीराम का भव्य मन्दिर 500 वर्षों के बाद जिस स्वरूप में दिखाई दे रहा है, वह प्रत्येक सनातन धर्मावलम्बी को गौरव की अनुभूति कराता है। अयोध्या एक बार फिर सनातन धर्मावलंबियों के लिए गौरव का केन्द्र बनी है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि जब बजरंगबली संजीवनी बूटी लेने के लिए गए थे तो उनके रास्ते में भ्रम पैदा करने के लिए कालनेमि आया था, लेकिन हनुमान जी उसे पहचान गए थे। इसी प्रकार सभी रामभक्तों को अपने अन्दर ऐसी शक्ति अर्जित करनी चाहिए कि सनातन धर्म की एकता और सनातन गौरव के मार्ग में किसी प्रकार का भ्रम या संशय उत्पन्न न हो। हमें सही दिशा में आगे बढ़ना है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि इसी गति की परिणति आज काशी में काशी विश्वनाथ धाम के भव्य स्वरूप में देखने को मिल रही है। अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि और अन्य धामों का भव्य विकास हुआ है। प्रयागराज में महाकुम्भ का आयोजन हुआ तो सनातन धर्मावलम्बियों को पहली बार यह अनुभूति हुई कि हमारा आयोजन इतना भव्य और दिव्य भी हो सकता है।
वर्ष 2021 में वृन्दावन में आयोजित वैष्णव कुम्भ का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 2019 में प्रयागराज कुम्भ के बाद वृन्दावन के वैष्णव सन्तों ने वैष्णव कुम्भ आयोजित करने की इच्छा व्यक्त की थी। उन्होंने सन्तों से कहा था कि वैष्णव कुम्भ का आयोजन करिए, सरकार सहयोग करेगी। कोरोना कालखण्ड के दौरान वर्ष 2021 में वैष्णव कुम्भ का भव्य आयोजन हुआ।