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देश के पूर्व राष्ट्रपति मिसाइल मैन एपीजे अब्दुल कलाम की पुण्यतिथि आज

Sarvoday Times 6 years ago 1 minute read 0 comments
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देश के पूर्व राष्ट्रपति मिसाइल मैन एपीजे अब्दुल कलाम को भारत के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा जा चुका है. देश हमेशा उनका ऋणी रहेगा.

एपीजे अब्दुल कलाम एक महान विचारक रहे, लेखक रहे और वैज्ञानिक भी रहे. हर क्षेत्र में उनका अहम योगदान रहा.

अब्दुल कलाम का निधन 27 जुलाई 2015 को मेघालय के शिलांग में हुआ था. ऐसे में आज उनकी पुण्यतिथि पर आइए जानते हैं उनके बारे में कुछ खास बातें और साथ ही कैसे ख़्वाब देखना और उसे पूरा करना कोई कलाम साहब की जिंदगी से सीख सकता है.

अब्दुल कलाम का जन्म तमिलनाडु के रामेश्वरम में 15 अक्टूबर को हुआ था. उनका परिवार नाव बनाने का काम करता था. कलाम के पिता नाव मछुआरों को किराए पर दिया करते थे.

बचपन से ही कलाम की आंखें कुछ बनने का ख़्वाब देखती थी. हालांकि उस वक्त परिस्थियां इतनी अच्छी नहीं थी. वह स्कूल से आने के बाद कुछ देर तक अपने बड़े भाई मुस्तफा कलाम की दुकान पर भी बैठते थे, जो कि रामेश्वरम् रेलवे स्टेशन पर थी.

फिर दूसरे विश्व युद्ध के शुरू होने पर जब ट्रेन ने रामेश्वरम् रेलवे स्टेशन पर रूकना बंद कर दिया था, तब अख़बार के बंडल चलती ट्रेन से ही फेंक दिए जाते थे.

उनके भाई शम्सुद्दीन को एक ऐसे इन्सान की ज़रूरत थी जो अख़बारोंको घर-घर पहुंचाने में उनकी मदद कर सके, तब कलाम ने यह ज़िम्मेदारी निभाई. जब उन्होंने अपने पिता से रामेश्वरम् से बाहर जाकर पढ़ाई करने की बात कही

तो उन्होंने कहा कि हमारा प्यार तुम्हें बांधेगा नहीं और न ही हमारी जरूरतें तुम्हें रोकेंगी. इस जगह तुम्हारा शरीर तो रह सकता है, लेकिन तुम्हारा मन नहीं.

इसके बाद कलाम ने 1950 में इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए त्रिची के सेंट जोसेफ कालेज में दाख़िला लिया. इसके बाद उन्होंने बीएससी की. फिर अचानक उन्हें लगा कि उन्हें बीएससी नहीं करना चाहिए था.

उनका सपना कुछ और था. वह इंजीनियर बनना चाहते थे. बीएससी करने के बाद उन्होंने ठान लिया कि अब वह किसी भी तरह मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग में एडमीशन लेकर रहेंगे.

कलाम का विश्वास और मेहनत ही थी कि उन्हें दाखिला मिल गया. उस वक्त एरोनॉटिकल इंजीनियरिंगकी फ़ीस 1000 रूपये थी. फ़ीस भरने को उनकी बड़ी बहन ने अपने गहने गिरवीं रखे और उन्होंने गिरवीं गहनों को अपनी कमाई से ही छुड़ाने की बात मन में ठानी.

इसके बाद पढाई शुरू तो हुई लेकिन कॉलेज में जैसे-जैसे वक़्त बीतने लगा वैसे-वैसे विमानों में उनकी दिलचस्पी बढ़ने लगी. अब पायलट बनने का ख्याल दिल में आया.

जब उन्होंने इंजीनियरिंग की पढाई कर ली तो उनके सामने दो रास्ते थे. पहला एअरफ़ोर्स में पायलट बनने का ख़्वाब जो कलाम ने देखा था तो वहीं दूसरा रक्षा मंत्रालय के वैज्ञानिक बनने का.

कलाम ने अपने ख्वाबों को तरजीह दी और एअरफ़ोर्स में पायलट के इन्टरव्यू के लिए दक्षिण भारत से उत्तर भारत रवाना हो गए.इंटरव्यू में कलाम साहब ने हर प्रश्न का जवाब दिया लेकिन जब इंटरव्यू के परिणाम आए तो उनको मालूम हुआ कि जिंदगी अभी और कठीन परीक्षा लेगी.

आठ लोग चुने गए और कलाम साहब का नंबर नौवां था. वह समझ गए हालात अभी मुश्किल होने वाले हैं. कलाम दिल्ली आकर एक जगह वैज्ञानिक के पद पर काम करने लगे तब उनका मासिक वेतन दो सौ पचास रूपये मात्र था.

यहां वह विमान बनाने का काम करते थे. फिर तीन साल बाद ’वैमानिकी विकास प्रतिष्ठान’ का केन्द्र बंगलुरू में बनाया गया और उन्हें इस केन्द्र में भेज दिया गया.

इसके बाद उन्हें उन्हें स्वदेशी हावरक्राफ़्ट बनाने की ज़िम्मेदारी दी गई जो काफी मुश्किल मानी जाती थी. लेकिन कलाम ने यह भी कर दिखाया. उन्होंने और उनके सहयोगियों ने हावरक्राफ़्ट में पहली उड़ान भरी.

रक्षा मंत्री कृष्णमेनन ने कलाम की खूब तारीफ की और कहा कि इससे भी शक्तिशाली विमान अब तैयार करो. उन्होंने वादा किया कि वह ऐसा करेंगे लेकिन जल्द कृष्णमेनन रक्षा मंत्रालय से हटा दिए गए और कलाम साबह उन्हें दोबारा कमाल कर के नहीं दिखा पाए.

कलाम की जिंदगी से जुड़ी कुछ खास बातें

1. जब जूता बनाने वाला और ढाबा मालिक बने मेहमान

2002 में राष्ट्रपति बनने के बाद डॉक्टर पहली बार केरल गए थे. उस वक्त केरल राजभवन में राष्ट्रपति के मेहमान के तौर पर दो लोगों को न्योता भेजा गया. पहला था जूते-चप्पल की मरम्मत करने वाला.. और दूसरा एक ढाबा मालिक…तिरुवनंतपुरम में रहने के दौरान इन दोनों से उनकी मुलाकात हुई थी..

2. ट्रस्ट को दान कर देते थे अपनी पूरी तन्ख्वाह

डॉ कलाम ने कभी अपने या परिवार के लिए कुछ बचाकर नहीं रखा. राष्ट्रपति पद पर रहते ही उन्होंने अपनी सारी जमापूंजी और मिलने वाली तनख्वाह एक ट्रस्ट के नाम कर दी. उऩ्होंने कहा था कि चूंकि मैं देश का राष्ट्रपति बन गया हूं, इसलिए जबतक जिंदा रहूंगा सरकार मेरा ध्यान आगे भी रखेगी ही. तो फिर मुझे तन्ख्वाह और जमापूंजी बचाने की क्या जरूरत.

3. जूनियर वैज्ञानिक व्यस्त था तो उसके बच्चे को खुद प्रदर्शनी ले गए

डॉ कलाम जब DRDO के डायरेक्टर थे…तो उसी दौरान एक दिन एक जूनियर वैज्ञानिक ने डॉ कलाम से आकर कहा कि ‘मैंने अपने बच्चों से वादा किया है कि उन्हें प्रदर्शनी घुमाने ले जाऊंगा. इसलिए आज थोड़ा पहले मुझे छुट्टी दे दीजिए.’ कलाम ने खुशी-खुशी हामी भर दी. लेकिन काम में मश्गूल वैज्ञानिक ये बात भूल गया.. जब वो रात को घर पहुंचा तो ये जानकर हैरान रह गया कि डॉ कलाम वक्त पर उसके घर पहुंच गए और बच्चों को प्रदर्शनी घुमाने ले गए…

4. मंच पर बड़ी कुर्सी पर बैठने से मना किया

मौका था साल 2013 में IIT वाराणसी में दीक्षांत समारोह का… बतौर मुख्य अतिथि वहां पहुंचे डॉक्टर कलाम ने कुर्सी पर बैठने से मना कर दिया.. क्योंकि वो वहां मौजूद बाकी कुर्सियों से बड़ी थी…कलाम बैठने के लिए तभी राजी हुए जब आयोजकों ने बड़ी कुर्सी हटाकर बाकी कुर्सियों के बराबर की कुर्सी मंगवाई.

5. DRDO की दीवारों पर कांच लगाने से मना किया

डॉ कलाम कितने संवेदनशील थे…इसका वाकया DRDO में उनके साथ काम कर चुके लोग बताते हैं. 1982 में वो DRDO यानी भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान में डायरेक्टर बनकर आए थे. DRDO की सुरक्षा को और पुख्ता करने की बात उठी. उसकी चारदीवारी पर कांच के टुकड़े लगाने का प्रस्ताव भी आया. लेकिन कलाम ने इसकी सहमति नहीं दी. उनका कहना था कि चारदीवारी पर कांच के टुकड़े लगे..तो उस पर पक्षी नहीं बैठ पाएंगे और उनके घायल होने की आशंका भी बढ़ जाएगी. उनकी इस सोच का नतीजा था कि DRDO की दीवारों पर कांच के टुकड़े नहीं लगे.

6.बिजली गुल हुई तो छात्रों के बीच जाकर भाषण दिया

साल 2002 की बात है. डॉ कलाम का नाम अगले राष्ट्रपति के रूप में तय हो चुका था. उसी दौरान एक स्कूल ने उनसे छात्रों को संबोधित करने की गुजारिश की. बिना सुरक्षा तामझाम के डॉ कलाम उस कार्यक्रम में शरीक हुए. 400 छात्रों के सामने वो भाषण देने के लिए खड़े हुए ही थे कि बिजली गुल हो गई. आयोजक जबतक कुछ सोचते…डॉ कलाम छात्रों के बीच पहुंच गए और बिना माइक के अपनी बात रखी और छात्रों के सवालों का जवाब दिया.

7 .जब कलाम ने हाथ से बनाकर भेजा ग्रीटिंग कार्ड

डॉ. कलाम…दूसरों की मेहनत और खूबियों को तहेदिल से सराहते थे और अपने हाथों से थैंक्यू कार्ड बनाकर ऐसे लोगों को भेजा करते थे. डॉ कलाम जब राष्ट्रपति थे. उस दौरान नमन नारायण नाम के एक कलाकार ने उनका स्केच बनाया और उन्हें भेजा. नमन के पास जब राष्ट्रपति डॉ कलाम का हाथ से बना थैंक्यू कार्ड और संदेश पहुंचा…तो वो भौंचक्के थे. उन्हें उम्मीद नहीं थी कि देश के महामहिम इस तरह दोस्ताना अंदाज में उन्हें शाबासी देंगे.

8. IIM अहमदाबाद की कहानी

डॉ कलाम में एक बड़ी खूबी ये थी कि वो अपने किसी प्रशंसक को नाराज नहीं करते थे. बात पिछले साल की है. डॉ कलाम IIM अहमदाबाद के एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बनकर गए. कार्यक्रम से पहले छात्रों ने डॉ कलाम के साथ लंच किया और छात्रों की गुजारिश पर उनके साथ तस्वीरें खिंचवाने लगे. कार्यक्रम में देरी होता देख आयोजकों ने छात्रों को तस्वीरें लेने से मना किया. इस पर कलाम ने छात्रों से कहा कि ‘कार्यक्रम के बाद मैं तबतक यहां से नहीं जाऊंगा जबतक आप सबों के साथ मेरी तस्वीर न हो जाए.’ ऐसे थे डॉक्टर कलाम.

9. मां की जली रोटी पर पिता के व्यवहार ने दी सीख

मिलने आने वाले बच्चों को डा. कलाम अक्सर अपने बचपन का एक किस्सा बताया करते थे. किस्सा तब का है …जब डॉ कलाम करीब आठ-नौ साल के थे. एक शाम उनके पिता काम से घर लौटने के बाद खाना खा रहे थे. थाली में एक रोटी जली हुई थी.

रात में बालक कलाम ने अपनी मां को पिता से जली रोटी के लिए माफी मांगते सुना. तब पिता ने बड़े प्यार से जवाब दिया- मुझे जली रोटियां भी पसंद हैं. कलाम ने इस बारे में पिता से पूछा तो उन्होंने कहा- जली रोटियां किसी को नुकसान नहीं पहुंचाती हैं, कड़वे शब्द जरूर नुकसान पहुंचाते हैं. इसलिए रिश्तों में एक दूसरे की गलतियों को प्यार से लो…और जो तुम्हें नापसंद करते हैं, उनके लिए संवेदना रखो.

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