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अधिक पूर्णिमा कहलाती है ‘सर्व सिद्धिदायिनी’

Sarvoday Times 5 months ago 1 minute read 0 comments
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अधिक मास में पड़ने वाली पूर्णिमा को ‘अधिक पूर्णिमा’ कहा जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, यह पूर्णिमा आम पूर्णिमा से कई गुना ज्यादा शक्तिशाली और फलदायी मानी जाती है। इसका मुख्य कारण यह है कि अधिक मास अर्थात पुरुषोत्तम मास स्वयं भगवान विष्णु को समर्पित होता है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, इस दौरान किए गए व्रत, दान व पूजा का पुण्य कई गुणा अधिक मिलता है।

क्या है अधिक पूर्णिमा?
हिंदू कैलेंडर के अनुसार, सौर वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच 11 दिनों का अंतर आता है। इसी संतुलन बनाए रखने के लिए हर तीसरे साल (लगभग ढाई से तीन वर्ष के अंतराल पर) एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है। इसे ही ‘अधिक मास’, ‘मलमास’ या ‘पुरुषोत्तम मास’ कहा जाता है। इस अत्यंत पावन महीने में पड़ने वाली पूर्णिमा को ही ‘अधिक पूर्णिमा’ कहा जाता है, जो कई वर्षों के इंतजार के बाद आती है।

भगवान विष्णु से है सीधा संबंध
श्रीविष्णु सहस्रनाम के अनुसार, भगवान विष्णु का एक दिव्य नाम ‘पुरुषोत्तम’ भी है, जिसका अर्थ है—’पुरुषों में उत्तम’। शास्त्रों के अनुसार, इस अतिरिक्त मास के स्वामी स्वयं भगवान विष्णु हैं, इसलिए इसे पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। चूंकि यह पूर्णिमा स्वयं श्रीहरि के प्रिय महीने में आती है, इसलिए इस दिन की गई पूजा से भगवान विष्णु के साथ-साथ साधक को माता लक्ष्मी का भी आशीर्वाद मिलता है। यही कारण है कि इसे सामान्य पूर्णिमा से कहीं अधिक प्रभावशाली माना गया है।

क्यों कहलाती है ‘सर्व सिद्धिदायिनी पूर्णिमा’?
स्कन्दपुराण, पद्मपुराण, नारदपुराण और भविष्यपुराण जैसे धर्म ग्रंथों में अधिक मास की पूर्णिमा को ‘सर्व सिद्धिदायिनी पूर्णिमा’ के रूप में दर्शाया गया है। आम पूर्णिमा पर जहां चंद्र देव और लक्ष्मी जी की पूजा होती है, वहीं अधिक पूर्णिमा पर नारायण और लक्ष्मी जी की संयुक्त पूजा से असीम कृपा बरसती है। यह पूर्णिमा आपके जीवन के सभी कष्टों को दूर कर सिद्धियों के द्वार खोलती है।

मिलते हैं ये लाभ
इतना ही नहीं विभिन्न पुराणों के अनुसार, इस पावन तिथि पर दान, जप, व्रत और कथा श्रवण करने से 100 यज्ञों के समान पुण्य फल मिलता है।
इस दिन भगवान विष्णु की विशेष आराधना करने से जाने-अनजाने में हुए सभी पापों का शमन होता है और जातक मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।
इस दिन किए गए कार्यों का फल कभी नष्ट नहीं होता, इसलिए अधिक पूर्णिमा को अक्षय पुण्य देने वाली तिथि कहा जाता है।

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