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अयोध्या मामला: 18 पुनर्विचार याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट आज कर सकता है सुनवाई

Ranjeet Gupta 7 years ago (Last updated: 7 years ago) 1 minute read 0 comments
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 अयोध्या मामले में दायर की गई पुनर्विचार याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट गुरुवार (12 दिसंबर) को सुनवाई कर सकता है. 5 जजों की बेंच ‘इन चैंबर’ सुनवाई में तय करेगी कि पुनर्विचार याचिकाओं पर ओपन कोर्ट में सुनवाई की जरूरत है या नहीं. अयोध्या मामले पर नौ नवंबर को फ़ैसला सुनाने वाली पांच जजों की बेंच में शामिल चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई रिटायर हो गए हैं जिनकी जगह जस्टिस संजीव खन्ना होगें. 

अब ये मामला चीफ़ जस्टिस एस ए बोबडे, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर और जस्टिस संजीव खन्ना सुनेंगे. अगर कोर्ट ओपन कोर्ट हियरिंग तय करता है, मतलब सभी पक्षकारों को दोबारा सुना जाएगा और अगर कोर्ट ने तय किया कि ओपन कोर्ट सुनवाई की जरूरत नहीं है, तो पुनर्विचार याचिकाएं कल ही ख़ारिज हो जाएंगी.

शीर्ष अदालत ने नौ नवंबर को सुनाए गए अपने फैसले में विवादित जमीन को राम मंदिर निर्माण के लिए देने की बात कही थी. इसके साथ ही अदालत ने मुस्लिम पक्षकारों को अयोध्या में किसी अन्य स्थान पर मस्जिद निर्माण के लिए पांच एकड़ जमीन देने का निर्देश जारी किया था. सुप्रीम कोर्ट के चैंबर में सुनवाई दोपहर 1:40 बजे शुरू होगी. शीर्ष अदालत में नौ नवंबर के फैसले के संबंध में कुल 18 पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गई हैं. इसमें से अधिकतर याचिकाएं फैसले से अंसतुष्ट मुस्लिम पक्षकारों की हैं.

निर्मोही अखाड़ा ने भी SC में पुनर्विचार याचिका दायर की
अयोध्या मामले में निर्मोही अखाड़ा ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. याचिका में कहा गया है कि निर्मोही अखाड़ा के शैबियत राइट्स, कब्जे और लिमिटेशन के बारे मे फैसले के निष्कर्ष सही नही है, फैसले पर कोर्ट पुनर्विचार करे.

मालूम हो कि तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता में पांच न्यायाधीशों की पीठ ने सर्वसम्मति से पूरी 2.77 एकड़ विवादित जमीन राम लला को दे दी. शीर्ष कोर्ट ने केंद्र को यूपी सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में मस्जिद के निर्माण के लिए 5 एकड़ का भूखंड आवंटित करने का भी निर्देश दिया.

पुनर्विचार याचिका में कहा गया है, ‘1857 के बाद से मूर्तियां बाहरी प्रांगण में थीं. यह आपराधिक अतिक्रमण के जरिए 22-23 दिसंबर 1949 को यहां जबरन रखे जाने के अलावा कभी अंदरूनी भाग में नहीं थीं. अदालत ने स्वीकार किया कि मूर्तियों को अवैध रूप से आंतरिक प्रांगण में रखा गया था और फिर भी मुस्लिम पक्ष के खिलाफ आदेश दिया गया.’

पुनर्विचार याचिका में कहा गया, ‘यह स्वीकार करते हुए कि स्वामित्व के उद्देश्य से अंग्रेजों द्वारा बनाई गई रेलिंग असंगत है और यह मान लेना पूरी तरह से गलत है कि हिंदू कब्जे या स्वामित्व के लिए दावा कर सकते हैं.’

पुनर्विचार याचिका ने मामले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) रिपोर्ट की सीमा को भी उजागर किया.

याचिका में कहा गया, ‘एएसआई का निष्कर्ष था कि यह साबित नहीं किया जा सकता है कि एक मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई. संभावनाओं के आधार पर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है कि 1528-1856 के बीच मुसलमान वहां नमाज नहीं पढ़ते थे, क्योंकि इस दौरान यह स्थल मुगलों व बाद में नवाबों के शासन के अधीन था.’

पहली पुनर्विचार याचिका 2 दिसंबर को मौलाना सैयद अशद रशीदी द्वारा दायर की गई. रशीदी मूल वादी एम सिद्दीक और उत्तर प्रदेश जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष हैं.

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