नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता में आए 12 साल से ज्यादा हो चुके हैं। इस दौरान सरकार ने कई बड़े और विवादित फैसले लिए। कुछ फैसले लागू हुए, कुछ पर लंबी राजनीतिक लड़ाई चली और कुछ ऐसे भी रहे, जिन पर भारी विरोध के बाद सरकार को अपना कदम पीछे खींचना पड़ा। अब 25 जुलाई 2026 को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इसी कड़ी में नया अध्याय बन गया है।
नीट-यूजी पेपर लीक और परीक्षा की विश्वसनीयता पर उठे सवालों के बाद देश भर में छात्रों का आंदोलन तेज हुआ। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व में आंदोलन ने प्रधान के इस्तीफे को अपनी प्रमुख मांग बनाया। विपक्ष भी इस मांग के साथ खड़ा हो गया। आखिरकार प्रधान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना इस्तीफा सौंप दिया। लेकिन क्या इसे सीधे-सीधे ‘मोदी सरकार झुक गई’ कहना सही होगा?
यही इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प सवाल है। क्योंकि प्रधान ने अपने इस्तीफे को सरकार की हार के तौर पर पेश नहीं किया। अपने पत्र में उन्होंने कहा कि पिछले दिनों की घटनाओं से वह बेहद दुखी हैं और छात्रों के भविष्य को लंबे राजनीतिक और कानूनी विवाद में फंसने से बचाने के लिए उन्होंने इस्तीफा दिया है। यानी राजनीतिक तौर पर आंदोलन इसे अपनी जीत बता रहा है, जबकि सरकार की ओर से इसे जिम्मेदारी लेने और स्थिति को सामान्य करने के कदम के रूप में देखा जा सकता है
