7000 से अधिक लोगों को बेची, यूपी बोर्ड की फर्जी वेबसाइट बनाने वाले रैकेट के दो सदस्य गिरफ्तार
प्रयागराज। माध्यमिक शिक्षा परिषद की फर्जी वेबसाइट तैयार कर मार्कशीट और डिग्री बेचने वाले दो युवकों को साइबर पुलिस ने आजमगढ़़ से गिरफ्तार कर लिया है। बृहस्पतिवार को पुलिस ने दोनों आरोपियों को मीडिया के सामने पेश किया। डीसीपी गंगानगर कुलदीप सिंह गुनावत ने बताया कि दोनों गिरफ्तार आरोपी 2024 से अब तक सात हजार से अधिक मार्कशीट और डिग्री तैयार कर चुके थे। अदालत में पेश करने के बाद दोनों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।
प्रयागराज में साइबर क्राइम पुलिस ने एक ऐसे शातिर गिरोह का पर्दाफाश किया है, जो उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद की नकली वेबसाइट बनाकर छात्रों और अभिभावकों को बड़े पैमाने पर ठग रहा था।
इस गिरोह ने यूपी बोर्ड की असली वेबसाइट की हूबहू नकल करते हुए फर्जी वेबसाइट तैयार की। फिर इसके जरिए हजारों छात्रों और अभिभावकों से ठगी की। 12 सालों में करीब सात हजार फर्जी मार्कशीट बेच डाली। इस रैकेट के दो सदस्यों को गिरफ्तार किया गया है।
गिरफ्तार आरोपियों में शशि प्रकाश राय उर्फ राजन शर्मा और मनीष कुमार राय शामिल हैं। दोनों आजमगढ़ के रहने वाले हैं। पुलिस अफसरों के मुताबिक, पुलिस की गिरफ्त में आए दोनों आरोपियों ने पूछताछ में पूरी मॉडस ऑपरेंडी बयां की। आरोपियों ने बताया कि वह 2014 से इस काम में लगे हुए हैं। हम पहले फेसबुक पर “मार्कशीट में नंबर बढ़वाएं” और “डिग्री-मार्कशीट बनवाएं” जैसे विज्ञापन डालते थे। इन विज्ञापनों में संपर्क के लिए मोबाइल नंबर भी देते थे जो फर्जी आईडी पर लिए गए होते हैं।
जैसे ही कोई संपर्क करता था तो उसे फर्जी वेबसाइट को दिखाकर उन्हें भरोसे में लेते थे। यह बताते थे कि हम बोर्ड के ही कर्मचारी हैं जो पैसे खर्च करने पर नंबर बढ़वा सकते हैं। इसके बाद डील तय करते थे। पहले 10-15 हजार रुपये मांगते थे और मोलभाव करते हुए चार से पांच हजार में डील फाइनल करते थे। फिर फर्जी मार्कशीट या डिग्री तैयार कर देते थे।
पुलिस के अनुसार गिरफ्तार किए गए शशि प्रकाश राय ने पूछताछ में बताया कि मैं और मेरा साथी पहले छात्र या अभिभावक से कॉलेज, परीक्षा वर्ष, जनपद समेत अन्य जानकारियां ले लेते थे। इसके बाद उससे कहते थे कि 10-15 दिन में उनका काम हो जाएगा।
हमारे पास यूपी बोर्ड के साथ ही कई अन्य बोर्ड की मार्कशीट व सर्टिफिकेट, डिग्रियां डिजिटल फार्मेंट में स्टोर रहती हैं। जैसे ही डील फाइनल होती है, हम आल इन वन एडिट सॉफ्टवेयर के जरिए नाम, पिता का नाम, रोल नंबर जैसी जानकारियों को एडिट करके फर्जी डॉक्युमेंट तैयार कर देते हैं। डॉक्युमेंट तैयार होने के बाद इसकी डिलीवरी के लिए आरोपी कभी खुद नहीं जाते थे। वह क्लाइंट से उसका पता ले लेते थे और फिर इसे कोरियर कर देते थे।
पुलिस अफसरों का कहना है कि पूछताछ में सामने आया कि यह खेल कोई नया नहीं था। मुख्य आरोपी शशि प्रकाश राय उर्फ राजन शर्मा पिछले करीब 12 साल से इस धंधे में था। अब तक 7000 से ज्यादा फर्जी अंकपत्र और डिग्रियां बाजार में खपाई जा चुकी हैं। गिरोह ने अलग-अलग विश्वविद्यालयों की नकली मोहर, होलोग्राम और डिजाइन तैयार कर रखे थे।
