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लालू की अनुपस्थिति में आरजेडी ताश के पत्तों की तरह बिखरती जा रही यादव समुदाय चिंता का सबब बना

Sarvoday Times 6 years ago 0 comments
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राष्‍ट्रीय जनता दल (आरजेडी) प्रमुख लालू प्रसाद ने तकरीबन पांच साल पहले अपने परिवार के अन्य सदस्यों की दावेदारी को दरकिनार करते हुए बड़ी हसरत से अपने छोटे पुत्र तेजस्वी यादव को राजनीतिक उत्तराधिकार सौंपा था.

लालू यादव के सपने को आगे बढ़ाने की जिम्मदेरी तेजस्वी यादव के कंधों पर है, लेकिन लालू की अनुपस्थिति में आरजेडी ताश के पत्तों की तरह बिखरती जा रही है.

विधानसभा चुनाव से ठीक पहले एक के बाद एक नेता तेजस्वी का साथ छोड़ते जा रहे हैं. इनमें आरजेडी के मूलवोट बैंक माने जाने वाले यादव समुदाय के नेता भी शामिल हैं, जो आरजेडी के लिए चिंता का सबब बन गया है.

बिहार विधानसभा चुनाव के लिए नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए एकजुट नजर आ रहा है. हालांकि, एलजेपी नेता चिराग पासवान के ताजा बयान ने एनडीए को लेकर चर्चा भी छेड़ दी है.

लेकिन दूसरी तरफ महागठबंधन में शामिल सहयोगी दल तेजस्वी यादव को अपना नेता मानने को तैयार नहीं हैं. पूर्व सीएम जीतन राम मांझी उन्हें अभी अनुभवहीन मानते हैं, वहीं कांग्रेस भी तेजस्वी के समर्थन में खुलकर नहीं बोल रही है. इतना ही नहीं तेजस्वी के चलते आरजेडी नेता भी पार्टी लगातार छोड़ते जा रहे हैं.

हाल ही में पांच विधान परिषद सदस्यों ने पार्टी छोड़ जेडीयू का दामन थाम लिया है जबकि रघुवंश प्रसाद जैसे दिग्गज नेता ने राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है.

आरजेडी छोड़ जेडीयू का दामन थामन वालों में कमर आलम मुस्लिम तो दिलीप राय यादव समुदाय से आते हैं. इसके अलावा अब प्रदेश उपाध्यक्ष और पूर्व विधायक विजेंद्र यादव ने आरजेडी से इस्तीफा दे दिया है जबकि पूर्व विधायक भोला यादव ने भी बगावत का झंडा उठा रखा है.

हाल ही में पूर्व सीएम राबड़ी देवी के घर के बाहर राघोपुर से पूर्व विधायक भोला यादव ने अपने समर्थकों के साथ धरना दिया था. 1995 में भोला यादव ने अपनी सीट लालू प्रसाद यादव के लिए छोड़ दी थी, जिसके बाद लालू यादव राघोपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़े और जीत हासिल की.

इसके बाद से इसी सीट से राबड़ी देवी भी चुनाव लड़ीं और जीत हासिल की. इन दोनों के चुनाव की सारी जिम्मेदारी भोला यादव ने ही संभाली थी. फिलहाल लालू परिवार की इस पुश्तैनी सीट से खुद तेजस्वी यादव विधायक हैं और भोला यादव ने चुनाव में खामियाजा भुगतने की धमकी दे रखी है.

विजेंद्र यादव की भूमिका बिहार के भोजपुर इलाके में किंगमेकर के तौर पर रही है. पिछले 30 सालों से वो आरा और भोजपुर इलाके में आरजेडी के यादव चेहरे के तौर पर जाने जाते हैं.

मौजूदा समय में आरजेडी के प्रदेश उपाध्यक्ष पद पर थे. काफी दिनों से वो पार्टी से नाराज चल रहे थे. विजेंद्र कहते हैं कि अब आरजेडी में बुजुर्गों का सम्मान नहीं हो रहा है. उन्होंने कहा कि लालू यादव अब वो लालू नहीं रहे जो वे 1990 से 2000 के बीच हुआ करते थे. विजेंद्र यादव के भाई अरुण यादव संदेश से आरजेडी के विधायक हैं.

आरजेडी छोड़ने वाले विधान पार्षद दिलीप राय बिहार के सीतामढ़ी और शिवहर इलाके में पार्टी का चेहरा माने जाते थे. दिलीप राय ने आरोप लगाते हुए कहा कि तेजस्वी यादव पार्टी मनमाने तरीके से चला रहे हैं और पार्टी नेताओं की कोई राय नहीं ली जा रही है.

दिलीप राय ने कहा कि आरजेडी में सम्मान के साथ काम करने का माहौल नहीं रह गया है. नीतीश कुमार के काम ने बिहार की तकदीर और तस्वीर बदल दी है, जिसके चलते जेडीयू में शामिल हुए हैं. इस तरह से आरजेडी के अंदर भी तेजस्वी यादव को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं.

बिहार में यादव मतदाता 15 फीसदी के करीब है और आरजेडी का परंपरागत वोटर माना जाता है. लालू के इस मूल वोट बैंक यादव समुदाय पर बीजेपी से लेकर जेडीयू तक की नजर है. बता दें कि 2000 में बिहार में यादव विधायकों की संख्या 64 थी जो 2005 में 54 हो गई थी और फिर 2010 में संख्या घटकर 39 पर आ गई थी, लेकिन 2015 में बढ़कर 61 पहुंच गई.

2015 के विधानसभा चुनाव में लालू यादव की पार्टी ने 101 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिसमें उसने 48 सीटों पर यादवों को टिकट दिए थे. इनमें से 42 जीतने में सफल रहे थे.

अतिपिछड़ों को गोलबंद कर नीतीश कुमार सत्ता तक पहुंचने में कामयाब हुए थे. यादव राजनीति को बैलेंस करने के लिए 101 सीटों पर लड़ी जेडीयू ने भी 12 टिकट यादवों को दिए थे, जिनमें से 11 ने जीत दर्ज की थी. कांग्रेस ने 41 सीटों में से 4 पर यादव प्रत्याशी उतारे थे, जिनमें से दो जीतकर विधानसभा पहुंचे थे.

वहीं, भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए ने भी 2015 के चुनाव में यादव राजनीति को साधने की कोशिश की थी. एनडीए ने कुल 26 यादव प्रत्याशियों को उतारा था जिनमें 22 बीजेपी, दो एलजेपी और दो मांझी की पार्टी हम की ओर से थे. बीजेपी से 6 यादव विधायक जीतकर आए थे.

बिहार में आरजेडी के वोट शेयर में लगातार गिरावट आई है. 2004 के लोकसभा चुनाव में आरजेडी को कुल वोटों का 30.7 प्रतिशत मत मिला. बता दें कि जनता दल को 1990 के विधानसभा चुनावों में लालू यादव को पहली बार मुख्यमंत्री के रूप में नियुक्त करने से लगभग 5 प्रतिशत अधिक मत मिला.

इसके बाद से आरजेडी का वोट शेयर तब से लगातार गिर रहा है. 2000 लोकसभा चुनाव में 25 फीसदी, 2005 विधानसभा चुनाव में 23.45 फीसदी , 2009 के लोकसभा चुनाव में 19.3 फीसदी, 2010 के विधानसभा चुनाव में 18.8 फीसदी, 2014 के लोकसभा में 20.5 फीसदी प्रतिशत, 2015 के विधानसभा में 18.3 प्रतिशत और 2019 के आम चुनावों में 15.4 प्रतिशत मत आरजेडी को मिला है.

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