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दिल्ली से मुंबई व हावड़ा रेल लाइनों के दोनों ओर बन रही दीवार, 160 Km की रफ्तार से दौड़ेंगी ट्रेन

Ranjeet Gupta 7 years ago (Last updated: 7 years ago) 1 minute read 0 comments
Trains

 रेलवे ने दिल्ली-मुंबई और दिल्ली-हावड़ा रूट पर ट्रेनों की रफ्तार को 160 किलोमीटर तक बढ़ाने के लिए ट्रैक के दोनों और दीवार बनाने का काम शुरू कर दिया है। इस क्रम में 3000 किलोमीटर की लंबाई में ट्रैक के दोनों ओर दीवार बनाने के ठेके पहले ही जारी किए जा चुके हैं।

भविष्य में दोनों रूटों पर वंदे भारत जैसी सेमी-हाईस्पीड ट्रेनो के संचालन की योजना के तहत ट्रेनों को हादसों से बचाने तथा यात्रियों की सुरक्षा के लिए रेलवे ने अनेक कदम भी उठाए गए हैं। ट्रैक के दोनो ओर कंक्रीट की दीवारें खड़ी करने के ठेके दिया जाना उनमें से एक है।

इसके अलावा यात्रियों की सुरक्षा के कई अन्य उपाय भी किए गए हैं। ब्राडगेज लाइनों पर चौकीदार रहित क्रासिंगों को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। जबकि चौकीदार वाली क्रासिंगों को भी क्रमिक रूप से खत्म करने का अभियान शुरू करना शामिल है। इसके लिए ऐसी क्रासिंगों पर ओवरब्रिज अथवा अंडरपास बनाकर खत्म किया जा रहा है। क्रासिंग हादसे खत्म करने के लिए क्रासिंगों की इंटरलॉकिंग भी की जा रही है। अब तक 11,552 लेवल क्रासिंगों की इंटरलॉकिंग की जा चुकी है।

यही नहीं, ट्रैक के रखरखाव के काम मानवीय गलतियों को न्यूनतम करने के लिए मशीनों का उपयोग बढ़ा दिया गया है। जबकि चलती ट्रेनों में कोच और वैगन की यांत्रिक खामियों का पता लगाने के लिए ट्रैक पर ऑनलाइन मानीटरिंग आफ रोलिंग स्टॉक (ओएमआरएस) तथा ह्वील इंपैक्ट लोड डिटेक्टर (वाइल्ड) प्रणालियां लगाई जा रही हैं। अब तक 7 जगहों पर ओएमआरएस लगाए जा चुके हैं, जबकि 2 और जगहों पर इन्हें लगाया जा रहा है। इसी प्रकार 17 स्थानों पर वाइल्ड लगा दिए गए हैं।

हाल ही में रेलवे ने सिगनल प्रणाली के आधुनिकीकरण की पायलट योजना भी प्रारंभ की है। जिसके तहत बीना-झांसी समेत 640 किलोमीटर की कुल लंबाई वाले चार रूटों पर काम शुरू किया जा रहा है। इस प्रायोगिक परियोजना पर 1609 करोड़ रुपये की लागत आने का अनुमान है। इस प्रोजेक्ट के पूरा होने पर ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन (एटीपी) सिस्टम, ट्रेन कोलीजन एवाइडेंस सिस्टम (टीकैस) तथा कैब सिगनलिंग (जिसमें लोको पायलट को केबिन के भीतर मानीटर पर सिगनल दिखाई देता है) जैसी आधुनिक प्रणालियों की कुशलता को आजमा कर देखा जाएगा और फिर संपूर्ण रेलवे में इन्हें अपनाया जाएगा।

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